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SESSION: 01st October, 2025 {SATSANG}

|| नारायण नारायण ||

         

1st October 2025 बुधवार सत्संग का सारांश । सत्संग आपके लिए राज दीदी के दैविक सत्संग के खजाने से लाया गया है।


राज दीदी ने सत्र की शुरुआत करते हुए कहा कि एक 7-8 साल की छोटी सी बच्ची जिसका नाम था राधिका। रविवार के दिन  वह बच्ची बेहद खुश थी, इसलिए नहीं कि स्कूल की छुट्टी थी, इसलिए कि उसे पता था कि आज उसे 1 रुपए बतौर पॉकेट मनी मिलने वाला है, क्योंकि उसे हर रविवार को बतौर पॉकेट मनी 1 रुपए का सिक्का मिलता था। जैसे ही उसकी मां ने उसके हाथ में 1 रुपए का सिक्का थमाया उसने झट से मुट्ठी कस के बंद कर ली ताकि वह सिक्का गिर ना जाए और प्रोत्साहित होकर घर से बाहर भागी, मन में ढेर सारे विचार लेकर कि यह खरीदूंगी, वह खरीदूंगी। बाहर बहुत गर्मी थी और गर्मी में सबसे बेस्ट ऑप्शन होता है कि कुल्फी खरीद कर खाया जाए। पांच दिनों से उसने अपने मन को रोक के रखा था, वह रोज कुल्फी वाले को देखती थी और रविवार का इंतजार करती  थी। जब वह कुल्फी वाले को ढूंढते हुए एक गली से जा रही थी तो उसने देखा की कोई जमीन पर एक टोकरी लिए बैठा हुआ था, वह टोकरी रंग बिरंगे फूलों से, वेणी से और गजरो से भरी हुई थी। जैसे ही उसने गजरे देखें, उसे अपनी मां की याद आ गई कि मां को तो फूल और गजरे लगाने का बहुत शौख है। उस 1 रुपए से वह बच्ची या तो कुल्फी खा सकती थी या तो गजरे खरीद सकती थी, दोनों चीजें वह 1 रुपए से नहीं खरीद पाती थी। वह बच्ची कशमकश में पड़ गई कि यदि मैने गजरा खरीदा तो मुझे कुल्फी खाने के लिए और 7 दोनों का इंतजार करना होगा। उस  आठ साल की छोटी सी बच्ची ने बड़ी हिम्मत दिखाइ, झट से 1 रुपए का सिक्का उस गजरे वाले को पकड़ा दिया और कहा कि हमको इसका गजरा दे दो। गजरे वाले ने एक पत्ते में लपेटकर दो गजरे दे दिए। उसे हाथ में लेकर वह बच्ची बेहद आनंदित हो गई कि मेरी मां जब इसे देखेगी तो कितना खुश होगी और पहन कर कितनी सुंदर लगेगी। उसके अंग अंग में खुशी का एहसास झलक रहा था, उसे एहसास हो गया था कि मैंने कुछ अच्छा काम किया है। भाग कर जैसे ही वह अपने घर पहुंची तो देखा कि मां तो रसोई में व्यस्त है, उसने सोचा यह बहुत अच्छा समय है क्योंकि उसे सामने से देने में संकोच हो रहा था, उसने हाल के सेंटर टेबल पर वह पैकेट रख दिया और सोचा कि घर में किसी को पता ही नहीं चलेगा कि इसे कौन लेकर आया है और चुपचाप अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए वहां से चली गई । पीछे से उसकी मां ने पैकेट देखा और वह समझ गई कि यह किसका काम है। उसकी मां बेहद खुश हुई कि इतनी छोटी सी बच्ची में इतनी समझ है, उस 1 रुपए से वह कुल्फी भी तो खा सकती थी, कितना बड़ा त्याग किया उसने। जैसे ही वह बच्ची घर के भीतर आई तो उसकी मां उस पर जोर से चिल्लाई कि तुम्हें क्या फालतू खर्च के लिए 1 रुपए दिया गया था। उसकी मां के भीतर जो खुशी थी,  उस खुशी को उसे संभालना नहीं आया। उसकी मां के भीतर उस बच्ची के प्रति बहुत गर्व का भाव था लेकिन बाहर से उस बच्ची के साथ उसने जैसा व्यवहार किया उससे वह बच्ची सैहम गई कि मुझसे कोई गलती हो गई है और भविष्य में मुझे ऐसा नहीं करना है।

         

राज दीदी ने आगे कहा, कल्याणी कहती है कि हम लोगों में से अधिकांश लोग ऐसा नहीं करते क्या..?? अधिकांश लोगों को तो स्वीकार करना भी नहीं आता। जब हम कुछ स्वीकार करते हैं तो हम अपनी भावनाओं को जताने से डरते हैं। जब कोई हमें अप्रिशिएट करता है या प्यार जताता है तो बजाएं उसका आभार प्रकट करने के, हम उसे उपहास में उड़ा देते हैं। एक तरफ तो हम चाहते हैं कि लोग हमसे प्रेम करें, हम ईश्वर से प्रार्थना भी करते हैं कि हमारा जीवन प्रेम से भरा हुआ हो और दूसरी तरफ किसी ने यदि एक बार से ज्यादा पूरे दिन भर में कह दिया कि आई लव यू तो ऐसा सोचते हैं कि यह तो पीछे ही पड़ गया है, पता नहीं क्या काम है इसको। किसी ने यदि दो से तीन बार आभार प्रकट कर दिया तो ऐसा सोच बैठते हैं कि यह तो कमजोर है, जरूर इसे मुझसे कुछ काम है। हालांकि हमें अच्छा तो बहुत लगता है, जब कोई आभार प्रकट करता है लेकिन हमें उस भावना को हैंडल करना नहीं आता, स्वीकार करना नहीं आता। यदि किसी ने तारीफ कर दी कि आपकी ड्रेस बहुत अच्छी लग रही है, तो हम कहते हैं कि अरे यह तो पुरानी है। किसी ने यदि आपके बनाए खाने की प्रशंसा कर दी तो आप कहते हैं कि मुझे तो खाना बनाना आता ही कहां है। धन्यवाद करने के बजाय हम नकारात्मक स्टेटमेंट दे देते हैं, फिर कुछ समय बाद हमें ऐसा लगता है कि लोगों की तो प्रशंसा होती है लेकिन हमारी क्यों नहीं होती।

      

राज दीदी ने आगे कहा, हम लोगों ने इंटरनेट के माध्यम से इतना नॉलेज भर रखा है कि हमें हर चीज में नुक्स निकालने की आदत सी हो गई है। जब हमारे पास कोई उपहार आता है तो जीस प्रेम और भाव के साथ वह उपहार दिया गया है, उसे स्वीकारने के बजाए हम उस चीज का दाम चैक करने लगते हैं। अपना सारा फोकस उस चीज की हाइट और कलर कैसा है, उसमें लगा देते हैं, हम प्रेम को तोलने लगते हैं। राज दीदी ने कहा, अरे जो चीज तोली नहीं जा सकती उसे क्या तोलोगे आप लोग!! ऐसा करने से आप उस उपहार का और उपहार देने वाले का, दोनों का अनादर करते हैं। मान लिया कि जो उपहार आया वह आपकी चॉइस और स्टैंडर्ड का नहीं था, या आपके काम का नहीं था लेकिन किसी के तो काम आ सकता है। आपका तो स्टेटस है लेकिन आप से जो कमजोर है उसके तो वह चीज काम आ सकती है। जिसने दिया है उसकी भावनाओं की कदर कीजिए। आपको खुश होना चाहिए कि ऐसे तो मैं इस व्यक्ति के लिए खरीद कर लाती कि नहीं लाती यह मुझे पता नहीं है, जिसको आप देने वाले हैं उसके भाग्य का आपके हाथ में रेडीमेड आ गया ताकि आप उसे प्रेम से आगे बढ़ा सके।

         

राज दीदी ने आगे बताया, अध्यात्म गुरु मिस्टर राघव से एक व्यक्ति ने कहा कि लोग मुझसे सच्चा प्रेम नहीं करते हैं, खुद के स्वार्थ के लिए प्रेम करते हैं, उनका मतलब रहता है तब प्रेम करते हैं, प्रेम का दिखावा करते हैं, मुझसे डर के प्रेम करते हैं, सच्चा प्यार मुझसे कोई नहीं करता। अध्यात्म गुरु मिस्टर राघव का जवाब था कि क्यों इतना बोझ लिए घूम रहे हो। सामने वाले के प्रेम करने के कारण को हटा दो, तो फिर आपके पास प्रेम ही प्रेम बचेगा।

        

राज दीदी ने आगे कहा, मदर टेरेसा ने एक बहुत सुंदर बात कही है कि दूसरों को जज करना छोड़ दीजिए वरना आपके पास प्रेम करने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। ध्यान रहे, जीवन में प्रेम और प्रचुरता साथ-साथ चलते हैं। अक्सर हमको शिकायत होती है कि हमसे कोई प्रेम नहीं करता, हमारे जीवन में प्रेम की बहुत कमी है। जब आप मिक्सर ग्राइंडर यूज़ करते हैं तो उसमें लिखा होता है कि जार को 75% ही भरो लेकिन आप उसे 90% तक भर देते हैं और उसमें यह भी लिखा होता है कि दबा दबा कर ना भरे। आपने यदि उसे दबा दबा कर भर दिया तो ऑन करके देखिए, वह नहीं घूमेगा। घूमेगा क्या…?? जिस क्षण हमें ऐसा लगे कि हमसे कोई प्रेम नहीं करता, उस क्षण हमारे भीतर दबा दबा कर प्रेम भरा होता है। जैसे मिक्सर चलाने के लिए जार में से थोड़ा खाली करना होता है ना, वैसे ही आप में उसने जो दबा दबा कर प्रेम भर रखा है उसे थोड़ा बाटिए, क्योंकि उस समय प्रेम बांटने की जरूरत है।


मुख्य शब्द : स्वीकार करना सीखिए, प्यार बांटिए, भाव, प्रचुरता। 


नारायण धन्यवाद

राज दीदी धन्यवाद

सादर सप्रेम सहित

स्वाति जोशी 🙏🙏

मलाड, मुंबई

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|| Narayan Narayan ||


The Satsang of 1st October, Wednesday is brought to you from the Treasure box of Raj Didi’s Divine Satsang.

         

Didi commenced the session with a story : Raj Didi narrated about a 8-year-old girl named Radhika. One Sunday, she was very happy—not because it was a holiday, but because she knew she would receive her weekly pocket money of ₹1. As soon as her mother gave her the coin, she held it tightly and ran outside, thinking about all the things she could buy.

Since it was hot, her first thought was to buy kulfi, which she had resisted for five days. But on the way, she saw a vendor selling flowers and hair garlands. She remembered how much her mother loved wearing flowers. With just that ₹1, she could either buy kulfi or two garlands—not both. After a moment of courage, she chose the garlands, thinking of her mother’s happiness. She joyfully placed the packet secretly on the center table at home and went out to play, not wanting recognition. Her mother, noticing, was touched by her daughter’s thoughtfulness and sacrifice. Yet, instead of expressing joy, she outwardly scolded her for wasting money—though inside she felt deep pride. This left the child hurt and hesitant to repeat such an act in the future.

         

Raj Didi explained : Many of us also fail to accept and express gratitude. When someone shows appreciation or love repeatedly, we start doubting their intentions. Even in compliments—like about our dress or food—we often deflect instead of simply saying thank you. Later, we feel unappreciated ourselves. Through overexposure to knowledge (like via the internet), we’ have  developed a habit of criticism instead of honoring the love and intent behind gifts. By focusing on price, looks, or usefulness, we disrespect both the gift and the giver.


She emphasized :If a gift does not suit you, it may still serve someone else. Value the giver’s feelings. Spiritual teacher Mr. Raghav once told a man who complained no one truly loved him : “Remove the reasons why others love you—fear, need, or self-interest—and what remains is pure love.”


Mother Teresa also said : “If you judge people, you will have no time to love them.”

Love and Abundance always go together. If we feel unloved, it often means love is stored within us but needs to be shared, like a mixer jar that must not be overfilled to function.


Key Message : Learn to Accept, Appreciate, Share Love, Gestures, Abundance.


Narayan Dhanyawad 

Raj Didi Dhanyawad

Regards

Mona Rauka 🙏


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1 Comment


Krishna Chotalia
Krishna Chotalia
Oct 01, 2025

Narayan Narayan didi , koti koti pranam, I love the way you inculcate these positive things within us through these sweet and small knowledgeable stories. I tell these stories to my students as I am a teacher. Love you Raj didi.🙏🏻

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