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SESSION: 18th February, 2026 {SATSANG}


Raj Didi's thought for the day.
Raj Didi's thought for the day.

|| नारायण नारायण ||

         

18th February 2026 बुधवार सत्संग का सारांश । सत्संग आपके लिए राज दीदी के दैविक सत्संग के खजाने से लाया गया है।


नारायण नारायण नारायण नारायण

      

राज दीदी ने सत्र की शुरुआत मे मिस्टर राघव द्वारा कही गई एक बात शेयर की। मिस्टर राघव कहते हैं कि जब भी मैं कोई अच्छी बात देखता हूं, सुनता हूं, करता हूं मैं तुरंत ही उस बात को अपने परिचितों से शेयर करता हूं। मेरे माता-पिता ने यह आदत मेरे भीतर बचपन से ही डाल दी थी। मेरा यह प्रबल विश्वास है कि जब हम अच्छी बातों का आदान प्रदान करेंगे तब यह दुनिया और अच्छी हो जाएगी। इसी सोच के साथ राघव कहते हैं कि मैं सुधा मूर्ति जी, जो इंफोसिस के श्री नारायण मूर्ति जी की पत्नी है उनके माध्यम से प्रथम अध्याय की शुरुआत करता हूं। 

          

श्रीमती मूर्ति लिखती है कि यूं.एस.ए में फंड रेजिंग का (चंदा इकट्ठा करना) एक विशेष तरीका है जो कि वहां बहुत लोकप्रिय है। वे लोग अलग-अलग तरीके से सही व्यक्ति को पकड़ते हैं ताकि उस व्यक्ति से डोनेशन की रकम हासिल हो सके और आजकल वही तरीका हमारे भारत में भी अपनाया जा रहा है। 

       

श्रीमति मूर्ति आगे लिखती है कि मेरी एक मैथिली नाम की सहेली है जो की एक एनजीओ के लिए काम करती है और वह संस्था गरीब बच्चों की परवरिश करती है। यह संस्था बच्चों के रहने, खाने पीने और एजुकेशन की व्यवस्था करती है। इस संस्था में चंदा इकट्ठा करने का काम मैथिली करती है। मैथिली स्मार्ट है, होशियार है और एक मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करती है। एक दिन सुबह-सुबह मैथिली का फोन आया और उसने मुझे एक अमीर महिला के घर चलने को कहा। लगभग 1 महीने से मैथिली उस अमीर महिला से मिलने के लिए उसके पीछे पड़ी थी। उस महिला ने उसके फार्म हाउस में मिलने का आज ही का अपॉइंटमेंट दिया है। उसका फार्म हाउस शहर से 40 किलोमीटर की दूरी पर था और मैथिली वहां अकेले जाने में संकोच कर रही थी इसलिए मुझे साथ में चलने के लिए कह रही थी। मेरे पास समय था तो मैंने हामी भर दी। सुबह-सुबह ही हम 40 किलोमीटर की यात्रा करके उस अमीर महिला के फार्म हाउस में चले गए। वहां जाकर हमने देखा कि बड़े से फार्महाउस पर उस अमीर महिला का बड़ा सा बंगला था, बंगले के चारों ओर गार्डन था और जबरदस्त सिक्योरिटी थी। पहले तो हमसे बहुत सारे प्रश्न पूछे गए उसके बाद सिक्योरिटी ने इंटरकॉम पर सेठानी से बातचीत की, वहां से परमिशन मिलने के बाद हमें बंगले के भीतर जाने दिया गया। श्रीमती मूर्ति कहती है कि बंगले की अंदर की व्यवस्था देखकर में भौंचक्की रह गई, क्योंकि बंगला बाहर से तो ठीक-ठाक था लेकिन भीतर से जबरदस्त बना हुआ था। सुंदर पेंटिंग, एक से एक कीमती सामान से सजा हुआ, बीच में वॉटर फाउंटेन लगा हुआ और जगह-जगह ताजे फूलों से सजे हुए गुलदस्ते लगे थे और पूरा का पूरा कमरा चंदन की सुगंध से महक रहा था। सेठानी, जो की अंदाजन 50 साल की होगी वह सामने झूले पर बैठी हुई थी। अपनी उम्र से कई अधिक यंग लग रही थी। शिफॉन की साड़ी और बढ़िया कीमती गहने पहने हुए थे। अगल बगल में 2 स्मार्ट सेक्रेटरी थी। ज्यों ही सेठानी ने हमें गेट पर देखा वहीं से इशारा किया कि नजदीक के सोफे पर आकर बैठ जाओ। श्रीमती मूर्ति लिखती है कि हम दोनों नजदीक पहुंचे और सोफे पर बैठ गए, सोफा बड़ा ही कंफर्टेबल था पर हम अनकंफर्टेबल थे क्योंकि वहां पर स्माइल की और वेलकम करने के तरीके इन दो चीजों की जबरदस्त कमी थी। न तो सेठानी हमें देखकर मुस्कुराई और न ही किसी तरह से हमारा स्वागत किया। सिर्फ इशारा कर दिया कि यहां पर बैठ जाओ। श्रीमती मूर्ति कहती है कि आपके घर पर जो भी मेहमान आता है वह आपकी अमीरी या स्टेटस से प्रभावित या आकर्षित नहीं होता। आपकी मुस्कान उसे आकर्षित करती है, आपके वेलकम करने का तरीका उसे आकर्षित करता है। यही दो चीज आपसी संबंधों को मजबूत करने में मदद करती है और इन्हीं चीजों की वहां कमी थी। मैं और मैथिली सोफे पर बैठ गए और मैथिली ने अपनी संस्था के बारे में बताना शुरू किया। एक एक चीज मैथिली विस्तार से बता रही थी क्योंकि उसे तो वहां से चंदा इकट्ठा करना था। वह अमीर महिला हमारी बात ध्यान से सुन रही थी पर किसी भी तरीके का रिएक्शन या रिस्पांस नहीं दे रही थी। मैथिली ने अपनी बात पूरी की और शांति से बैठ गई क्योंकि उसे किसी भी तरह का सहयोग नहीं मिल रहा था। श्रीमती मूर्ति कहती है कि जो लोग भीतर से तेज होते हैं वे लोग अपने मन की बात किसी पर भी जाहिर नहीं होने देते। जो लोग सीधे सरल होते हैं अपनी बुरी बातें  सामने वाले पर जाहिर कर देते हैं, जैसा कि मैथिली ने किया। मैथिली ने अपनी पूरी बात बता दी पर उस अमीर महिला ने किसी भी तरह का रिस्पांस नहीं दिया। थोड़ी देर के लिए कमरे में शांति पसर गई। करीबन सात आठ मिनट बाद उस अमीर महिला ने सिर्फ इतना कहा कि आप अपने पेपर यहां पर छोड़ दीजिए,  मेरी सेक्रेटरी को दे दीजिए हम आपको फोन पर इतला करेंगे। 


श्रीमती मूर्ति लिखती है कि हमारे उत्साह पर ढेरों पानी फिर गया। हम बेहद उम्मीद के साथ उसके पास गए थे और वहां से यह सोचते हुए हताश निराश लौटे कि यह बात तो वह हमें फोन पर भी कह सकती थी। हमारा आज का आधा दिन तो बेकार हो गया और हम वापस लौट आए‌।

         

श्रीमती मूर्ति आगे लिखती हैं कि इस घटना के लगभग एक महीने बाद मैं एक स्कूल ओपनिंग सेरेमनी में गई। वहां मैंने देखा कि वही अमीर महिला चीफ गेस्ट बनकर आई हुई थी। उसे चीफ गेस्ट देखकर मैंने मैथिली से पूछा कि इस अमीर महिला ने कितना डोनेशन दिया..?? मैथिली ने मेरा हाथ पकड़ कर दबाया, मुझे कोने में ले गई और मुझे धीरे से बोली कि इस अमीर महिला से पैसे निकलवाना बहुत मुश्किल था। उसने बड़ी मुश्किल से 10000 रूपए दिए वह भी इस शर्त के साथ कि मुझे चीफ गेस्ट बनाया जाए और मेरी फोटो अखबारों में छपे। 

श्रीमति मूर्ति ने मैथिली से कहा कि जब इस महिला ने इतनी सारी शर्तें रखी थी तो तुम्हें एक बड़ी रकम मांग लेनी चाहिए थी। मैथिली का कहना था कि संस्था के लिए चंदा इकट्ठा करना बहुत ही मुश्किल होता है। यह अमीर महिला अपने ऊपर तो हजारों रुपए खर्च करने को तैयार है पर जब डोनेशन की बात आती है तो 10000 बार सोचती है। हर व्यक्ति कुछ ना कुछ पाने के इरादे से ही डोनेशन देता है। जितना मिला हमने स्वीकार कर लिया। 

श्रीमती मूर्ति कहती है कि इस बाबत मुझे किसी भी प्रकार का एक्सपीरियंस नहीं था इसलिए जैसा मैथिली ने कहा मैंने मान लिया। 

         

श्रीमती मूर्ति आगे लिखती है कि 8-10 दिन के लिए मैं शहर से बाहर गई हुई थी। जब भी मैं वापस लौटती हूं और मुझे ड्यूटी पर जाना होता है तो मुझे घबराहट होती है क्योंकि 8 दिन की छुट्टी के बाद ड्यूटी ज्वाइन करने में मुझे घबराहट होती है। मुझे इसलिए घबराहट होती है क्योंकि पीछे से ढेर सारे लेटर्स और ईमेल्स आ जाते हैं और फिर मुझे उन सभी को चेक करना होता है। जैसे ही मैं ऑफिस पहुंची मैंने देखा कि हमेशा की तरह लेटर्स का ढेर लगा हुआ था। मैं और मेरी सेक्रेटरी बैठकर चिट्टियां छाटने लगे। थोड़ी देर बाद मेरी सेक्रेटरी ने मुझे एक चिट्ठी ला कर दी, उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव थे। मैंने उससे पूछा कि इसमें ऐसा क्या लिखा है कि तुम्हारे चेहरे पर आश्चर्य के भाव है, उसने कहा 'मैम आप ही पढ़ लीजिए।' मैंने पढ़ना शुरू किया, उसमें लिखा था रिस्पेक्टेड मैम, आप मुझे नहीं जानती, पर मैं आपको अच्छी तरह जानता हूं, आपके बारे में न्यूज़ पेपर में पढ़ता रहता हूं। आप समाज के लिए बहुत सेवा करती है, गरीब बच्चों को एजुकेशन प्रदान करती है। सभी डिटेल्स मैं न्यूज़पेपर में पढ़ता रहता हूं और साथ ही साथ आपके आर्टिकल्स, आपकी लिखी कहानियां भी पढ़ता हूं, मैं आपसे बेहद इंप्रेस हूं। 

श्रीमती मूर्ति कहती है कि मेरी प्रशंसा में पूरी चिट्ठी भरी हुई थी। मैंने वह चिट्ठी फिर से अपनी सेक्रेटरी को यह कहकर दी कि सुबह-सुबह मुझे ऐसी चिट्टियां मत दिया करो क्योंकि काम का वक्त होता है, यह चिट्ठी लो और इसे फाइल कर दो। सेक्रेटरी ने मुझसे पूछा कि मैम आपने इस चिट्ठी को पूरा पढ़ा क्या..?? इसे पूरा पढीये, यह थोड़ी हटकर है। मैंने चिट्ठी वापस ली और आगे पढ़ना शुरू किया, उसमें लिखा हुआ था कि मैं बूढ़ा हूं, जगह-जगह यात्रा करके आपकी तरह दूसरों की सेवा नहीं कर सकता, पर मैं सेवा करना चाहता हूं। मेरे पास जो भी जमा पूंजी है वह मैं आपको ड्राफ्ट के रूप में भेज रहा हूं। मुझे पता है कि आपके पास दूसरों की सेवा करने के लिए बहुत सारा धन है‌ पर मैं चाहता हूं कि जो भी मेरे पास जमा पूंजी है वह सेवा में लग जाए। मेरी करबद्ध प्रार्थना है कि जो मैं चार लाख का ड्राफ्ट भेज रहा हू उसे आप समाज सेवा में लगा दीजिए। मैं आपसे यह नहीं पूछूंगा कि वह रुपया आपने किसे दिया, कहा दिया और क्यों दिया। बस आपसे यह प्रार्थना है कि यह रुपया आप समाज सेवा में लगा दीजिए। 


श्रीमती मूर्ति कहती है कि मैंने देखा लेटर के साथ चार लाख का ड्राफ्ट अटैच्ड था। अब आश्चर्यचकित होने की बारी मेरी थी क्योंकि आज तक जितने भी पत्र मेरे पास आए थे उनमें पैसों की डिमांड लिखी हुई होती थी और कई पत्र तो शिकायत से भरें होते थे कि जो रुपया आपने दिया वह कम पड़ा और पैसे चाहिए। यह लेटर तो 'आउट ऑफ़ द वे जाकर था।' मैंने लेटर को आगे से, पीछे से सब जगह से देखा पर कहीं भी भेजने वाले का नाम पता नहीं था। मैंने अपनी सेक्रेटरी से पूछा कि क्या उसे पता है कि यह चिट्ठी कहां से आई है, लेकिन उसे भी नहीं पता था। लिफाफे में लगा पोस्टल स्टैंप देखकर हम सिर्फ इतना समझ पाए कि वह चिट्ठी चेन्नई से आई थी। 

श्रीमती मूर्ति कहती है कि मैंने वह ड्राफ्ट हाथ में लिया, वह चिट्ठी हाथ में ली और ईश्वर से उसके लिए प्रार्थना की, उसके लिए आशीर्वाद मांगा। मेरे जेहेन में मुझे वह अमीर महिला याद आ गई, कितना फर्क था दोनों में। 

        

राघव कहते हैं कि मैंने यह कहानी पढ़ी, मुझे अच्छी लगी। इस कहानी से मैंने बहुत कुछ सीखा पर दो चीज विशेष सीखी :

१. हमारे घर में जो भी मेहमान आते हैं वह हमारी अमीरी या स्टेटस से प्रभावित या आकर्षित नहीं होते हैं बल्कि हमारे वेलकम करने के तरीके से आकर्षित होते हैं। 

2. हमारे पास जितना भी पर्याप्त मात्रा में धन है वह हमें दूसरों की भलाई में इस्तेमाल करना चाहिए। 

 

हमारा शास्त्र कहता है कि अतिथि देवो भव! नारायण शास्त्र कहता है कि अतिथि को आप जिस भाव के साथ देखते हैं, जिस चाव के साथ देखते हैं वैसे ही बरकत आपके घर में होती है। यदि आप अतिथि को देव के रूप में देखते हैं, जैसे कि शास्त्र कहता है - आपके घर की सुख, शांति, समृद्धि  में बढ़ोतरी होती है। यदि आप अतिथि को अनवांटेड के रूप में देखते हैं तो आपके जीवन में वैसी ही अवस्था हो जाती है। 

       

राघव ने आगे कहा कि इस कहानी से मैंने सिखा कि जितनी व्यवस्था मेरे पास है उसमें से मैं दूसरों की जितनी सहायता कर सकता हूं, करूंगा। 


मुख्य शब्द : दान, धन, अतिथि सत्कार, अतिथि देवो भव.! 


नारायण धन्यवाद

राज दीदी धन्यवाद

सादर सप्रेम सहित

स्वाति जोशी 🙏🙏

मलाड, मुंबई


NRSP's Raj Didi's thought for the day
Raj Didi's thought for the day

|| Narayan Narayan ||

 

The Summary of the Wednesday Satsang – 18th February 2026. This Satsang is brought to you from the Divine Treasure of Raj Didi’s Satsangs. 

     

Raj Didi began the session through an incident shared by Mr. Raghav. Mr. Raghav says that whenever he see, hear, or learn something good, he immediately shares it with others. This habit was instilled in him by his parents since childhood. He strongly believes that when we exchange good thoughts, the world becomes a better place. 


With this thought, he began the first chapter inspired by Sudha Murty, wife of Narayan Murthy of Infosys. Mrs. Murty writes that in the USA, fundraising has a very special and popular style. People use various strategies to approach the right person and obtain donations. Nowadays, similar methods are being adopted in India as well. She further writes about her friend Maithili, who works for an NGO that takes care of poor children by providing them shelter, food, and Education. Maithili is responsible for fundraising. She is smart, intelligent, and belongs to a middle-class family. One morning, Maithili called Mrs. Murty and asked her to accompany her to meet a wealthy woman. Maithili had been trying for almost a month to secure an appointment with her. Finally, the woman agreed to meet them at her farmhouse, located 40 kilometers away from the city. Maithili felt hesitant to go alone, so Mrs. Murty agreed to accompany her.


When they reached the farmhouse, they saw a huge bungalow with beautiful gardens and strong security arrangements. After several security checks and permission through the intercom, they were allowed inside. The interior was luxurious - expensive paintings, valuable décor items, a water fountain in the center, fresh flower arrangements everywhere, and the fragrance of sandalwood filling the air. The lady of the house, around 50 years old but looking much younger, was sitting on a swing wearing a chiffon saree and expensive jewellery, with two smart secretaries standing beside her.


She gestured them to sit but neither smiled nor welcomed them warmly. Mrs. Murty observes that guests are not impressed by wealth or status, but by warmth and a welcoming smile. These two qualities strengthen relationships — and both were missing there. Maithili explained her NGO’s work in detail, hoping to secure a donation. The wealthy woman listened attentively but gave no reaction. After 7–8 minutes of silence, she simply said, “Leave your papers with my secretary, we will inform you by phone.” They returned disappointed, feeling their half day had been wasted.


About a month later, Mrs. Murty attended a school opening ceremony where the same wealthy woman was the chief guest. Mrs. Murty asked Maithili how much donation she had given. Maithili revealed that it was very difficult to get money from her. She donated 10,000 Rupees only, on the condition that she must be the chief guest and her photograph must be published in the  newspapers.


Maithili explained that fundraising is very difficult. Some people are ready to spend thousands on themselves but think many times before donating. Most people donate with some expectation in return. Whatever they receive, they accept gratefully. A few days later, Mrs. Murty returned from an 8–10 day trip and went to her office. As usual, there was a pile of letters and emails waiting. While sorting them, her secretary handed her a letter that seemed unusual.


The letter praised her work in social service and mentioned that the writer regularly read about her in newspapers and was deeply impressed. Initially, she asked the secretary to file it away, but upon reading further, she found something extraordinary. The writer mentioned that he was old and could not personally serve society like her. Therefore, he was sending his entire savings of 4,00,000 Rupees in the form of a bank draft. He requested her to use it for social service. He did not wish to know how or where the money would be spent, he only wanted it to be used for helping others. The letter had no name or address. The envelope showed it was posted from Chennai. Mrs. Murty was deeply moved. Most letters she received asked for funds or complained that previous funds were insufficient. This letter was completely different. Holding the draft and the letter, she prayed for the unknown donor and blessed him. At that moment, she remembered the wealthy woman and realized the vast difference between the two.


Raghav says he learned two major lessons from this story :

1. Guests are not impressed by wealth or status but by warmth and hospitality.

2. Whatever resources we have, we should use them to help others as much as possible.


Our scriptures say, “Atithi Devo Bhava” — A guest is like God. The Narayan Shastra teaches that the feeling with which you welcome a guest determines the blessings in your home. If you treat guests as divine, prosperity and peace increases. If you treat them as unwanted, life reflects the same negativity.

      

Raghav concluded that from whatever he has, he will always try to help others as much as possible.


Key words : Donation, Funds, Hospitality, "Athithi Devo Bhav".


Narayan Dhanyawad 

Raj Didi Dhanyawad

Regards

Mona Rauka 🙏


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