SESSION: 30th July, 2025 {SATSANG}
- Narayan Reiki Satsang Parivar Team

- Jul 30, 2025
- 12 min read
|| नारायण नारायण ||
30th July 2025 बुधवार सत्संग का सारांश । सत्संग आपके लिए राज दीदी के दैविक सत्संग के खजाने से लाया गया है।
नारायण को हाजिर मानकर और मां सरस्वती का ध्यान करके राज दीदी ने इस सत्र की शुरुआत की। राज दीदी ने कहा कि नारायण शास्त्र कहता है कि हर छोटी-छोटी चीज में समृद्धि भरी हुई है, विशेष कर आपके स्वभाव और व्यवहार में। आपका स्वभाव और व्यवहार इतने शक्तिशाली है कि इनमें आपके नक्षत्रो को बदलने की क्षमता है और तो और इनमें आपके वास्तु को बदलने की भी क्षमता है। हम सब सुख, शांति, सेहत, समृद्धि, बरकत, बढ़ोतरी और प्रचुरता से भरा जीवन जीना चाहते है। इस एफर्मेशन को जो दोहराता जाएगा उस तक यह सब चीजें सहज ही पहुंच जाएगी।
राज दीदी ने आगे कहा कि हमारा लक्ष्य यह रहेगा कि इन चीजों को हासिल करने का रास्ता आपको बताया जाए, चलना आपको पड़ेगा। राज दीदी ने एक एग्जांपल देते हुए कहा कि यदि हम हमारे किसी परिचित से मिलते हैं और उससे पूछते हैं कि वह कहां रहता है, वह यदि मुंबई का रहिवासी हो और उसने कह दिया कि मैं पेद्दार रोड रहता हूं, तो हम अपने आप अनुमान लगा लेते हैं कि वह धनवान है, चाहे वह एक छोटे से कमरे में ही क्यों न रहता हो। ऐसे ही हमें भी पहचान बनानी है कि कोई भी हमें मिले और हमने उसे कह दिया कि हम NRSP से जुड़े हुए हैं, तो वह अगला आदमी समझ जाएगा कि यह भरपूर्ता भरा जीवन जी रहा है, उसको ज्यादा डिस्क्रिप्शन देना नहीं पड़ेगा। हमारी इमेज ऐसी रहेगी कि अगला सोचेगा कि यह व्यक्ति यदि NRSP से जुड़ा हुआ है तो इसका कैरेक्टर बहुत ऊंचा है, यह कभी गलत काम कर ही नहीं सकता। राज दीदी ने कहा कि जैसे हमारे पीएम के बारे में किसी की बोलने की हिम्मत नहीं होती, ऐसी ही अवस्था हम NRSP की भी हो जाएगी। राज दीदी ने कहा कि हमारे बताए हुए रास्ते पर यदि आप चलते हैं तो यह सब चीजें आपके जीवन में आनी निश्चित है। दूसरी बात यह है की आप यदि निरंतर सत्संग में आते हैं या सत्संग सुनते हैं तो यह सब चीज आपके सिस्टम में भी सेट हो जाएगी।
राज दीदी ने आगे कहा, कई बार लोग हमसे कहते हैं कि आप हमेशा समृद्धि और प्रचुरता के टॉपिक पर ही फोकस करते हो, इतना बड़ा सत्संग लेकर बैठे हो तो क्यों ना लोगों का अगला जीवन सुधारते हो। इसपर राज दीदी ने कहा, पहले यह जीवन तो सुधार ले.! प्रचुरता भरा जीवन इसलिए जीना चाहते हैं कि अगले जन्म के लिए बहुत कुछ जमा कर ले। राज दीदी ने आगे कहा कि आप तक तीन अध्याय पहुंचाए जाएंगे। पहला अध्याय: राघव कहते हैं कि एक राजा के मन में तीन प्रश्न आए। पहला प्रश्न: काम करने का महत्वपूर्ण समय कौन सा है..?? दूसरा प्रश्न: महत्वपूर्ण काम कौनसा है..?? तीसरा प्रश्न: महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन है?? यह सारे प्रश्न राजा ने राज्यसभा में अपने मंत्रियों के सामने रखें, पर उन्हें जो उत्तर मिला उससे वे संतुष्ट नहीं हुए। उनके एक मंत्री ने उन्हें राय दी की महाराज आप तक जो उत्तर पहुंचे हैं, उनसे यदि आप संतुष्ट नहीं हैं तो हमारे नगर के बाहर जंगल में एक महात्मा अपनी कुटिया में रहते हैं, यदि आप उनके पास जाते हैं तो निश्चित ही आपको आपके प्रश्नों के उत्तर प्राप्त हो जाएंगे। राजा सुबह-सुबह महात्मा जी से मिलने के लिए वन की ओर निकल पड़े। जब राजा वहां पर पहुंचा तो उसने देखा की महात्मा उनकी कुटिया के बाहर मिट्टी खोद रहे थे। राजा ने उन्हें प्रणाम करके अपने तीनों प्रश्न दोहरा दिए। महात्मा जी ने प्रश्न सुन लिए लेकिन कोई उत्तर नहीं दिया, मिट्टी खोदते रहे। राजा ने सोचा कि वह महात्मा वृद्ध है और सुबह से मिट्टी खोदते-खोदते थक गए होंगे, इसलिए मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पा रहे हैं। यदि वे थोड़ा विश्राम कर ले तो हो सकता है कि शायद मेरे प्रश्नों का उत्तर दे देवे। राजा ने बड़े आदर के भाव से उनसे वह खुरपी ले ली जिससे वे मिट्टी खोद रहे थे, राजा ने महात्मा से कहा की लाइए मैं खो देता हूं और उन्हें विश्राम करने साइड में बैठा दिया। मिट्टी खोदते-खोदते 10-15 मिनट बीत गए थे और राजा के मन में यह आया की विश्राम तो हो गया है, फिर से प्रश्न पूछ लेता हूं, शायद अब मुझे उत्तर मिल जाएगा। महात्मा जी ने प्रश्न सुनकर गहरी सांस ली और सामने गर्दन उठाकर देखा कि एक व्यक्ति जिसके सिर से खून बह रहा था वह दौड़ता हुआ राजा के तरफ आ रहा था। महात्मा जी ने कहा की राजा पहले देख लीजिए कि सामने से कौन व्यक्ति आ रहा है और उसको किस चीज की जरूरत है। राजा उस व्यक्ति की तरफ एक गिलास पानी का लेकर पहुंच रहा था और उतने में ही वह व्यक्ति बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। राजा ने उस पानी से उस व्यक्ति का घाव धोया, उसके मुंह पर पानी के छिटें मारे और खुद की पगड़ी फाड़ कर उसकी पट्टी बांधना शुरू कर दिया। राजा उसके घाव धोकर पट्टी बांध रहा था, इतनी देर में उस व्यक्ति को होश आ गया। उस व्यक्ति ने जैसे ही देखा की राजा ने खुद की पगड़ी फाड़ कर उसको पट्टी बांधी है तो झट से उठकर राजा के कदमों में गिर पड़ा और बोला कि महाराज, मेरे अपराध क्षमा कर दीजिए, मैं आजीवन आपकी सेवा में रहना चाहता हूं। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मैं तुम्हें जानता भी नहीं हूं, तुम किस चीज के लिए मुझसे माफी मांग रहे हो..?? उस व्यक्ति ने बताया कि कुछ समय पहले, युद्ध के दौरान मेरा भाई आपके हाथों मारा गया था, तब से मेरे मन में था कि मैं आपका वध करूं और मेरे भाई की हत्या का बदला लूं, तभी से ही मैं अवसर देख रहा था की कब मुझे मौका मिले और मैं आप पर हमला कर सकूं। कल मुझे पता चला कि आप यहां जंगलों में आने वाले हैं तो मैंने चाकू अपने जेब में रखा और आपके पीछे-पीछे हो लिया कि अवसर देखकर वार कर दूंगा लेकिन आपके दो सिपाहियों ने मुझे देख लिया और मुझे मारा। मैं किसी तरह से उनके चुंगल से भाग निकाला और मौके का इंतजार करते हुए आपका पीछा कर रहा था लेकिन मुझे पता चला कि आप तो बहुत दयालु है। इतने बड़े राजा होने के बावजूद भी आपने अपनी पगड़ी उतारी और उसे फाड़ कर मुझे पट्टी बांध दी, अब मैं आजीवन आपकी सेवा में ही रहना चाहता हूं, आप मेरे अपराधों के लिए मुझे क्षमा कर दीजिए। राजा ने उसे माफ करके नगर में वापस भेज दिया और फिर से उस साधु महात्मा के पास गया, उनसे कहने लगा कि महात्मा जी अब तो मेरे प्रश्नों का उत्तर दे दो। महात्मा जी ने कहा कि तुम्हें उत्तर नहीं मिला क्या..?? तुमने पहले प्रश्न पूछा कि महत्वपूर्ण समय कौन सा है। महत्वपूर्ण समय वह था जब तुम मिट्टी खोद रहे थे। मेरे जवाब न देने से यदि तुम सीधा उठकर चले जाते हैं और मिट्टी नहीं खोदते तो बाहर खड़ा व्यक्ति तुम पर हमला कर देता और तुम खत्म हो जाते थे। तुम्हारा दूसरा प्रश्न था कि महत्वपूर्ण काम कौन सा है। जब तुम उसकी पट्टी कर रहे थे, वह सबसे महत्वपूर्ण काम था। तुम्हारा तीसरा सवाल था कि महत्वपूर्ण व्यक्ति कौन है। महत्वपूर्ण व्यक्ति में हूं जिसके माध्यम से तुम शांतिपूर्वक वापस लौट रहे हो, फिर भी राजा अभी तक संतुष्ट नहीं हुए थे। महात्मा जी ने कहा कि शायद अभी तक तुम्हारे भीतर यह बात गई नहीं है, तो सीधी-सरल भाषा में सुन लो कि सबसे महत्वपूर्ण समय कौन सा है..?? वर्तमान..!! जितना अधिक इसका सदुपयोग कर सकते हो उतना कर लो। दूसरे प्रश्न का उत्तर: वर्तमान समय में जो काम तुम कर रहे हो वही सबसे महत्वपूर्ण काम है। उस कार्य को पूरी मेहनत, पूरी लगन और पूरी ईमानदारी से पूरा करो। तीसरे प्रश्न का उत्तर: वर्तमान समय में जो व्यक्ति तुम्हारे साथ है, तुम्हारे पास है वही सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है। जितना सुख, जितनी खुशी उसे दे सकते हो दो। मिस्टर राघव कहते हैं कि राजा ने उस अनुसार ही अपना जीवन बना लिया और बरसों तक सुखपूर्वक राज किया।
राज दीदी ने आगे कहा की जो कहानी अब हम आपको सुनाने जा रहे हैं वह शायद बहुत से लोगों ने सुनी होगी। टाइटन इंडस्ट्री के मिस्टर सुवेंदु रौय को एक बार एक रिक्शा चालक का इतना सुंदर अनुभव हुआ कि उन्होंने अपना अनुभव तुरंत ही सबके साथ बांटना शुरू कर दिया। मिस्टर रौय कहते हैं कि उस दिन रविवार था और मुझे मेरी बीवी और बच्चे के साथ अंधेरी से बांद्रा जाना था। मुझे एक खाली रिक्शा दिखा तो मैं उसके भीतर जाकर बैठ गया। जिस तरह हवाई जहाज के सीट के पीछे कुछ मैगजींस रखी हुई होती है वैसे ही इस रिक्शे में भी एक सुंदर सा झोला लटका हुआ था, उसमें तीन-चार तरह की मैगजींस थी और उस ड्राइवर के सीट के पीछे एक छोटा सा टीवी भी लगा हुआ था, एक फर्स्ट एड किट भी थी उस रिक्शे में। अब हमने उस रिक्शे का निरीक्षण करना शुरू किया तो देखा कि वहां एक छोटी सी दीवार घड़ी भी थी, कैलेंडर भी था, एक फायर एक्सटिंग्विशर भी था, और तो और मेरी खुशी तब बढ़ गई जब मैंने देखा कि उस रिक्शे में चारों धर्म के ईस्ट की फोटो लगी हुई थी और दूसरी तरफ जो 26 नवंबर को शहीद हुए थे, उनकी फोटो भी सुंदर तरीके से लगाई हुई थी। मुझे एहसास हुआ कि आज मैं साधारण रिक्शे में नहीं बैठा हूं। रिक्शा तो विशेष है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा विशेष रिक्शा चालक है। मिस्टर रौय कहते हैं कि मेरे मन में आया कि इस व्यक्ति के बारे में थोड़ी और जानकारी हासिल की जाए। उससे बातचीत करने पर पता चला कि वह पिछले 8-9 साल से रिक्शा चला रहा है, उसके पहले वह प्लास्टिक कंपनी में काम करता था। प्लास्टिक की कंपनी बंद हो गई तो परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए उसने रिक्शा चलाना शुरु कर दिया। वह हफ्ते के सातों दिन सुबह 8:00 बजे से रात को 10:00 बजे तक रिक्शा चलाता है, एक दिन भी छुट्टी नहीं लेता। उसकी दिनचर्या जानने के बाद मैं समझ गया कि उसे अतिरिक्त समय नहीं मिलता होगा, फिर भी मैंने पूछा कि तुम कुछ और भी करते हो क्या। रिक्शा चालक ने कहा कि हफ्ते में एक दिन जब मेरे पास थोड़ा सा पैसा इकट्ठा हो जाता है तो अंधेरी के एक वृद्ध आश्रम में जाता हूं और वहां तेल, कंगा, साबुन इत्यादि देकर आता हूं। मैं सोच रहा था कि क्या मैं किसी हीरो से मिल रहा हूं या यह व्यक्ति हीरा है। जब मैं और मेरी पत्नी उस रिक्शा चालक से बात कर रहे थे तब मेरा ध्यान रिक्शे के दोनों तरफ वापस गया। वहां एक स्टीकर लगा हुआ था जिस पर यह लिखा था कि जो शारीरिक और मानसिक रूप से बीमार है उनको मीटर के हिसाब से 25% डिस्काउंट दिया जाएगा और दूसरी तरफ लिखा हुआ था कि नेत्रहीन व्यक्ति के लिए ₹50 तक की यात्रा मुफ्त है। मिस्टर रौय कहते हैं की उस रिक्शा चालक के प्रति में नतमस्तक हो गया कि अपने सीमित साधनों में भी इसने कितनी सारी व्यवस्था कर रखी है। 45 मिनट की यात्रा में मैंने कितना कुछ सीख लिया। मैं जब गंतव्य तक पहुंचा तो मैंने उसे अधिक तो नहीं दिया। उसके मीटर का भाड़ा दिया और ऊपर से 50 ₹ एक्स्ट्रा दिए, यह कहकर कि किसी एक नेत्रहीन पैसेंजर के लिए मेरी तरफ से कंट्रीब्यूशन। मिस्टर रौय लिखते हैं कि उसने मुझे जीवन का बहुत बड़ा पाठ पढ़ाया। कई बार यह भाव भीतर आता है कि जब बहुत होगा तब देंगे दूसरों को, यदि यह भाव भी भीतर आ गया कि किसी को कुछ देना है तो प्रकृति अपने आप ही इंतजाम कर देती है। सीमित साधनों के भीतर उस रिक्शा चालक ने कितनी सुंदर व्यवस्था कर रखी थी। मिस्टर रौय ने नीचे उस रिक्शा चालक का नाम और नंबर दे रखा था, उस रिक्शे का नंबर भी दे रखा था, यह कहकर कि कभी आप मुंबई आए तो जरूर चेक करना। रिक्शा चालक का नाम संदीप बक्शी है, MH 02 Z 8508 उसके रिक्शे का नंबर है।
नारायण नारायण..!!
मुख्य शब्द : महत्वपूर्ण समय, महत्वपूर्ण काम, महत्वपूर्ण व्यक्ति।
नारायण धन्यवाद
राज दीदी धन्यवाद
सादर सप्रेम सहित
स्वाति जोशी 🙏🙏
मलाड, मुंबई
|| Narayan Narayan ||
The Summary of Divine Wednesday Satsang of 30th July 2025. (This divine satsang has been brought to you from The Treasure box of Raj Didi’s spiritual discourses).
Raj Didi began the session with Narayan blessings for everyone.
Didi said that Narayan Shastra teaches us that prosperity lies even in the smallest of things — especially in your nature and behavior. These two are so powerful, they have the capacity to change your destiny and even your circumstances.
We all wish to live a life full of peace, health, abundance, growth, and prosperity. If one keeps repeating this affirmation, eventually all these blessings will come to them.
Raj Didi emphasized that our goal is to show you the way, but walking the path is your responsibility. She gave an example: if we meet someone and ask where they live, and they say Peddar Road in Mumbai, we immediately assume they are wealthy, even if they live in a small room. Similarly, when someone hears that we are connected to NRSP, they should immediately recognize us as living a life of abundance — no extra description should be needed.
She added, our image should be such that anyone who hears we are associated with NRSP assumes we are noble and always adhere to good values. Just like no one dares to casually speak about the Prime Minister, such should be the prestige of NRSP. Raj Didi said that if we follow the path shown in satsang, all of this will surely manifest in our life. Also, if you keep attending or listening to satsang regularly, these values will gradually become embedded in your system. She addressed a common question people ask her — why does she always focus on prosperity and abundance..? Why not talk about improving the next life instead..? She answered beautifully: First let‘s improve this life. By living a life of abundance then we build a treasure for the next life as well.
Chapter 1: The Three Questions of the King
Raghav narrates the story of a king who had three important questions: 1. What is the most important time to do any work? 2. Which work is the most important? 3. Who is the most important person?
The king asked these questions to his ministers, but their answers didn‘t satisfy him. One minister suggested visiting a sage who lived in a forest near their kingdom.
The king visited the sage early in the morning and found him digging the ground outside his hut. After repeating his questions, the sage continued digging without answering. The king, noticing the sage was old and tired, offered to dig in his place so he could rest.
After 10–15 minutes, the king was about to ask again when they saw a man rushing towards them, bleeding from his head. The sage told the king to attend to him first. The king fetched water, cleaned his wound, tore his own turban to make a bandage, and cared for him until he regained consciousness.
Upon waking, the injured man touched the king‘s feet and begged for forgiveness, offering to serve him for life. The king was confused, and asked what wrong he had done..?? The man explained that the king had killed his brother in battle, and he had been looking to seek revenge. He planned to attack the king in the forest but was wounded by royal guards before he could reach him. Despite that, the king saved his life, and now he wanted to serve him instead of seeking revenge. The king forgave him and sent him back safely.
Returning to the sage, the king asked again for the answers to his questions.The sage replied: The most important time was when you were digging the earth. Had you left, the attacker would have killed you. The most important task was helping the wounded man — because that is what you were doing in the present. The most important person was the man you were helping, because he needed you at that moment. He simplified the answers:
The most important time is now — the present. The most important work is what you are doing in the present moment — do it with all your effort and sincerity. The most important person is whoever is with you right now — give them your love and care. Raghav concluded that the king lived the rest of his life happily based on this wisdom.
Chapter 2: The Special Rickshaw Driver
Raj Didi shared a real-life story that many might have heard, about Mr. Suvendu Roy of Titan Industries shared a life-changing experience he had with a Mumbai rickshaw driver.
One Sunday, Mr. Roy needed to travel from Andheri to Bandra with his wife and child. They got into a rickshaw that seemed ordinary at first, but soon he noticed something special — behind the driver‘s seat was a hanging pouch with magazines, a small TV screen, a first aid kit, a clock, calendar, fire extinguisher, and even photos of deities from four religions along with tributes to the 26/11 martyrs.
Impressed, Roy spoke to the driver and learned that he had worked in a plastic company which later shut down. Since then, he had been driving a rickshaw 7 days a week from 8 am to 10 pm. When asked if he did anything else, the driver shared that whenever he saved some extra money, he would go to an old-age home in Andheri and donate essentials like oil, soap, and combs.
Roy was amazed by the driver‘s sense of service and compassion. He saw stickers on both sides of the rickshaw: “25% discount for physically and mentally challenged passengers” “Free rides up to 50 ₹ for visually impaired passengers” At the end of the 45 minute journey, Roy paid the fare and added 50₹ extra, saying, “This is my contribution for the next visually impaired passenger.” He said the driver taught him a powerful lesson — we often say we will give when we have more. But when the desire to give awakens, nature makes arrangements. Despite limited means, this driver had created something truly inspirational. Mr. Roy even shared the driver’s name and number so people could meet him when they visit Mumbai: Name: Sandeep Bakshi Rickshaw No : MH 02 Z 8508.
Key Words : Important Time, Important person, Important task.
Narayan Dhanyawaad
Raj Didi Dhanyawaad
Regards
Mona Rauka 🙏


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